vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 111: मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
»
श्लोक 66
श्लोक
13.111.66
ब्राह्मणेभ्य: परं नास्ति पावनं दिवि चेह च।
उपवासैस्तथा तुल्यं तप:कर्म न विद्यते॥ ६६॥
अनुवाद
जैसे इस लोक में या परलोक में ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मणों से अधिक पवित्र कोई नहीं है, वैसे ही उपवास के समान कोई तप नहीं है।
Just as there is no one more pure than the Brahmins who know Brahman in this world or the next, similarly there is no penance like fasting. 66.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas