श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 111: मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  13.111.64 
यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु पाण्डव।
तावन्त्येव सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! उसके शरीर में जितने रोम हैं, उतने ही वह हजारों वर्षों तक स्वर्ग में सुखपूर्वक रहता है ॥64॥
 
Pandunandan! As many pores are there in his body, he lives happily in heaven for thousands of years. 64॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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