श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 111: मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  13.111.37 
अधिवासे सोऽप्सरसां नृत्यगीतविनादिते।
रमते स्त्रीसहस्राढ्ये सुकृती विरजो नर:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
वह गुणवान और रजोगुण से रहित पुरुष हजारों सुन्दरियों के महल में आनन्दित होता है, जहाँ नृत्य और गान की ध्वनियाँ गूंजती रहती हैं॥37॥
 
That man of virtue and devoid of Rajoguna enjoys the palace of thousands of celestial beauties, where the sounds of dance and song keep resonating.॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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