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mahabharat 13.109.80: गुरु से कभी ज़िद नहीं करनी चाहिए। युधिष्ठिर! अगर गुरु अप्रसन्न हों, तो हर संभव तरीके से उनका आदर करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  13.109.80 
गुरुणा चैव निर्बन्धो न कर्तव्य: कदाचन।
अनुमान्य: प्रसाद्यश्च गुरु: क्रुद्धो युधिष्ठिर॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
गुरु से कभी ज़िद नहीं करनी चाहिए। युधिष्ठिर! अगर गुरु अप्रसन्न हों, तो हर संभव तरीके से उनका आदर करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए।
 
One should never be stubborn with the Guru. Yudhishthira! If the Guru is unhappy, one should try to please him by respecting him in every way possible.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)