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mahabharat 13.109.77: जो व्यक्ति दीर्घायु होना चाहता है, उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प को नहीं छेड़ना चाहिए, भले ही वे दुर्बल क्यों न हों, क्योंकि ये सभी बहुत विषैले होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  13.109.77 
त्रीन् कृशान् नावजानीयाद् दीर्घमायुर्जिजीविषु:।
ब्राह्मणं क्षत्रियं सर्पं सर्वे ह्याशीविषास्त्रय:॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति दीर्घायु होना चाहता है, उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प को नहीं छेड़ना चाहिए, भले ही वे दुर्बल क्यों न हों, क्योंकि ये सभी बहुत विषैले होते हैं।
 
He who wishes to live long should not tease a Brahmin, a Kshatriya and a snake, even if they are weak, because all of them are very poisonous.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)