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mahabharat 13.109.37: क्रोध में आकर पुत्र या शिष्य के अतिरिक्त किसी को डंडे से नहीं मारना चाहिए, न ही उसे भूमि पर पटकना चाहिए। तथापि, शिक्षा के लिए पुत्र या शिष्य को दण्ड देना उचित माना गया है ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  13.109.37 
परस्य दण्डं नोद्यच्छेत् क्रुद्धो नैनं निपातयेत्।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याच्च शिक्षार्थं ताडनं स्मृतम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
क्रोध में आकर पुत्र या शिष्य के अतिरिक्त किसी को डंडे से नहीं मारना चाहिए, न ही उसे भूमि पर पटकना चाहिए। तथापि, शिक्षा के लिए पुत्र या शिष्य को दण्ड देना उचित माना गया है ॥37॥
 
In anger, one should not hit anyone with a stick except a son or disciple, nor should he throw him down on the ground. However, it is considered appropriate to punish a son or disciple for education. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)