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mahabharat 13.109.34: करणी, नालिका और नाराच - यदि ये शरीर में लग जाएँ तो वैद्य उन्हें शरीर से निकाल देते हैं, परन्तु शब्दरूपी बाण को निकालना असम्भव है; क्योंकि वह हृदय के भीतर चुभ जाता है ॥34॥   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  13.109.34 
कर्णिनालीकनाराचान् निर्हरन्ति शरीरत:।
वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदिशयो हि स:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
करणी, नालिका और नाराच - यदि ये शरीर में लग जाएँ तो वैद्य उन्हें शरीर से निकाल देते हैं, परन्तु शब्दरूपी बाण को निकालना असम्भव है; क्योंकि वह हृदय के भीतर चुभ जाता है ॥34॥
 
Karni, Naalika and Naarach - if these get stuck in the body then doctors remove them from the body, but it is impossible to remove the arrow in the form of words; Because it pierces inside the heart. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)