श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.108.45 
वासोभिरन्नैर्गोभिश्च शुभैर्नैवेशिकैरपि।
शुभै: सुरगणैश्चापि स्तोष्या एव द्विजास्तथा।
एतदेव परं गुह्यमलोभेन समाचर॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, गौएँ और सुन्दर घर देकर तथा कल्याणकारी देवताओं का पूजन करके उन्हें संतुष्ट करना चाहिए। समस्त लोभ को त्यागकर इस परम गोपनीय धर्म का पालन करना चाहिए ॥ 45॥
 
One should satisfy the brahmins by giving them food, clothes, cows and beautiful houses and by worshipping benevolent deities. You should follow this most secret religion, leaving behind all greed. ॥ 45॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्रह्मभगीरथसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १०३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्मा और भगीरथका संवादविषयक

एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०३॥
 
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