श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.108.42 
कामं यथावद्विहितं विधात्रा
पृष्टेन वाच्यं तु मया यथावत्।
तपो हि नान्यच्चानशनान्मतं मे
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
देवेश्वर! मैंने अपनी इच्छा के अनुसार व्रत किया है। आप सम्पूर्ण जगत के रचयिता हैं। यदि आप मुझसे पूछें, तो मैं आपको सब कुछ यथावत् बता दूँ, इसीलिए मैंने आपको सब कुछ बता दिया है। मेरी दृष्टि में व्रत से बढ़कर कोई दूसरा तप नहीं है। आपको नमस्कार है, आप मुझ पर प्रसन्न हों॥ 42॥
 
Deveshwar! I observed fasting according to my wish. You are the creator of the whole world. If you ask me, I should tell you everything as it is, that is why I have told you everything. In my opinion, there is no other penance better than fasting. Salutations to you, please be pleased with me.॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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