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mahabharat 13.108.33: मैंने चार कोस लम्बा-चौड़ा चम्पा वृक्षों का एक वन दान किया है, जिसका प्रत्येक वृक्ष रत्नजटित है, वस्त्र से लिपटा है और गले में स्वर्णमाला से सुशोभित है; परंतु उस दान के कारण भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 13.108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.108.33 
निष्कैककण्ठमददं योजनायतं
तद्विस्तीर्णं काञ्चनपादपानाम्।
वनं वृतानां रत्नविभूषितानां
न चैव तेषामागतोऽहं फलेन॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मैंने चार कोस लम्बा-चौड़ा चम्पा वृक्षों का एक वन दान किया है, जिसका प्रत्येक वृक्ष रत्नजटित है, वस्त्र से लिपटा है और गले में स्वर्णमाला से सुशोभित है; परंतु उस दान के कारण भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥33॥
 
I have donated a forest of Champa trees, four Kos long and wide, each tree of which was studded with precious stones, wrapped in cloth and adorned with a golden garland around its neck; but I have not come here even because of that donation. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)