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श्लोक  13.108.30-31 
हिरण्यरत्ननिचयानददं रत्नपर्वतान्।
धनधान्यसमृद्धाश्च ग्रामाश्चान्ये सहस्रश:॥ ३०॥
शतं शतानां गृष्टीनामददं चाप्यतन्द्रित:।
इष्ट्वानेकैर्महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो न तेन च॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मैंने आलस्य न करते हुए अनेक बड़े-बड़े यज्ञ किये और ब्राह्मणों को सोने और रत्नों के ढेर, रत्नजटित पर्वत, धन-धान्य से परिपूर्ण हजारों गांव और एक बार बच्चा देने वाली हजारों गायें दान कीं; परंतु उनके पुण्य से भी मैं यहां नहीं आया हूं।
 
Without any laziness, I performed many big sacrifices and donated heaps of gold and precious stones, mountains studded with gems, thousands of villages filled with wealth and grains and thousands of cows that had given birth once to the Brahmins; but even by their merits I have not come here.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)