श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.108.28 
शम्याक्षेपैरयजं यच्च देवान्
साद्यस्कानामयुतैश्चापि यत्तत्।
त्रयोदशद्वादशाहैश्च देव
सपौण्डरीकान्न च तेषां फलेन॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मैंने अनेक बार शम्यक्षेप यज्ञ किया है। मैंने दस हजार साद्यक यज्ञ किए हैं। मैंने तेरह और बारह दिन वाले यज्ञ तथा पुण्डरीक यज्ञ अनेक बार किए हैं; परन्तु उनके फल सहित भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ॥ 28॥
 
O lord! I have performed the 'Shamyakshepa*' yagna many times. I have performed ten thousand 'Sadyaka' yagnas. I have performed the yagnas that take thirteen and twelve days and the 'Pundarik' yagna many times; but even with their fruits I have not come here.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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