श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  13.108.26-27 
तपस्वी नियताहार: शममास्थाय वाग्यत:॥ २६॥
दीर्घकालं हिमवति गंगायाश्च दुरुत्सहाम्।
मूर्ध्ना धारां महादेव: शिरसा यामधारयत्।
न तेनाप्यहमागच्छं फलेनेह पितामह॥ २७॥
 
 
अनुवाद
पितामह! मैंने हिमालय पर दीर्घकाल तक संयमपूर्वक, मौन रहकर और शान्तचित्त होकर तपस्या की थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने गंगा की असह्य धारा को अपने सिर पर धारण किया था; किन्तु उस तपस्या के फलस्वरूप भी मैं इस लोक में नहीं आया हूँ॥ 26-27॥
 
Grandfather! I had performed penance for a long time on the Himalayas by eating in moderation, being silent and having a peaceful mind. Being pleased with this, Lord Shankar had held the unbearable stream of the Ganges on his head; but even as a result of that penance, I have not come to this world.॥ 26-27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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