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mahabharat 13.108.22-24h: पितामह! मैंने यज्ञ और पराक्रम में इन्द्र के समान पराक्रमी, स्वर्ण की मालाओं से सुशोभित गले वाले हजारों राजाओं को युद्ध में हराकर, प्रचुर धन से युक्त आठ राजसूय यज्ञ किए और ब्राह्मणों को दक्षिणा दी; परंतु उस पुण्य से भी मैं इस संसार में नहीं आया हूँ॥22-23 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.108.22-24h 
शक्रतुल्यप्रभावाणामिज्यया विक्रमेण ह॥ २२॥
सहस्रं निष्ककण्ठानामददं दक्षिणामहम्।
विजित्य भूपतीन् सर्वानर्थैरिष्ट्वा पितामह॥ २३॥
अष्टभ्यो राजसूयेभ्यो न च तेनाहमागत:।
 
 
अनुवाद
पितामह! मैंने यज्ञ और पराक्रम में इन्द्र के समान पराक्रमी, स्वर्ण की मालाओं से सुशोभित गले वाले हजारों राजाओं को युद्ध में हराकर, प्रचुर धन से युक्त आठ राजसूय यज्ञ किए और ब्राह्मणों को दक्षिणा दी; परंतु उस पुण्य से भी मैं इस संसार में नहीं आया हूँ॥22-23 1/2॥
 
Grandfather! Having defeated thousands of kings in war, who were as powerful as Indra in sacrifices and valour, whose necks were adorned with garlands of gold, I performed eight Rajasuya sacrifices with abundant wealth and gave them as dakshina to the Brahmins; but even with that virtue I have not come to this world. ॥22-23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)