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mahabharat 13.108.17: हे ब्रह्मन्! मैंने प्रत्येक यज्ञ में प्रतिदिन अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ बाँटी थीं; परंतु उसके पुण्य से भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ॥ 17॥   |   mahabharat अध्याय 13.108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.108.17 
कोटीश्च काञ्चनस्याष्टौ प्रादां ब्रह्मन् दशान्वहम्।
एकैकस्मिन् क्रतौ तेन फलेनाहं न चागत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! मैंने प्रत्येक यज्ञ में प्रतिदिन अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ बाँटी थीं; परंतु उसके पुण्य से भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ॥ 17॥
 
O Brahman! I had distributed 18 crores of gold coins every day in each yajna; but even by the merit of that I have not come here.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)