श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 108: ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  13.108.1-2 
युधिष्ठिर उवाच
दानं बहुविधाकारं शांति: सत्यमहिंसितम्।
स्वदारतुष्टिश्चोक्ता ते फलं दानस्य चैव यत्॥ १॥
पितामहस्य विदितं किमन्यत् तपसो बलात्।
तपसो यत्परं तेऽद्य तन्नो व्याख्यातुमर्हसि॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! आपने दान, शांति, सत्य और अहिंसा आदि अनेक प्रकार के गुणों का वर्णन किया। आपने हमें अपनी पत्नी में ही संतुष्ट रहने को कहा और दान का फल भी बताया। आपकी जानकारी के अनुसार तप से बढ़कर दूसरा कौन-सा बल है? यदि आपकी दृष्टि में तप से बढ़कर कोई और साधन है, तो उसे हमें समझाइए।॥ 1-2॥
 
Yudhishthira asked- Grandfather! You described many types of charity, peace, truth and non-violence etc. You told us to be satisfied with our own wife and also explained the results of charity. As per your knowledge, what other power is better than the power of penance? If in your opinion there is any better means than penance, then explain it to us.॥ 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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