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mahabharat 13.107.60-61: शतक्रतु बोले, "आप उन सत्यनिष्ठ ज्ञानी मुनियों में श्रेष्ठ हैं, जिनके हृदय में समस्त वेद छिपे हुए हैं। मैं आपके कल्याण का चिन्तन करके ही समृद्ध हुआ हूँ। इसीलिए आज मैं आप पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। ब्रह्मन्! मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ कह रहा हूँ कि आप इस पुत्ररूपी हाथी को लेकर शीघ्र आएँ। अब आप दीर्घकाल तक कल्याणमय लोकों को प्राप्त करने के अधिकारी हो गए हैं।" 60-61   |   mahabharat अध्याय 13.107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.107.60-61 
शतक्रतुरुवाच
येषां वेदा निहिता वै गुहायां
मनीषिणां सत्यवतां महात्मनाम्।
तेषां त्वयैकेन महात्मनास्मि
वृद्धस्तस्मात् प्रीतिमांस्तेऽहमद्य॥ ६०॥
हन्तैहि ब्राह्मण क्षिप्रं सह पुत्रेण हस्तिना।
त्वं हि प्राप्तुं शुभाँल्लोकानह्नाय च चिराय च॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
शतक्रतु बोले, "आप उन सत्यनिष्ठ ज्ञानी मुनियों में श्रेष्ठ हैं, जिनके हृदय में समस्त वेद छिपे हुए हैं। मैं आपके कल्याण का चिन्तन करके ही समृद्ध हुआ हूँ। इसीलिए आज मैं आप पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। ब्रह्मन्! मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ कह रहा हूँ कि आप इस पुत्ररूपी हाथी को लेकर शीघ्र आएँ। अब आप दीर्घकाल तक कल्याणमय लोकों को प्राप्त करने के अधिकारी हो गए हैं।" 60-61
 
Shatakratu said, "You are the foremost among those truthful wise sages in whose hearts all the Vedas are hidden. I have become prosperous only by thinking about your welfare. That is why I am very pleased with you today. Brahmin! I am saying with great joy that you should come quickly with this elephant which is like your son. You have now become entitled to attain the worlds of welfare for a long time." 60-61.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)