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mahabharat 13.107.6: उस महासर्प के मस्तक से मद की धारा बहने लगी, मानो पर्वत से झरना फूट रहा हो। एक दिन इन्द्र ने राजा धृतराष्ट्र का वेश धारण करके आकर उस हाथी को अपने वश में कर लिया।   |   mahabharat अध्याय 13.107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.107.6 
तं प्रभिन्नं महानागं प्रस्रुतं पर्वतोपमम्।
धृतराष्ट्रस्य रूपेण शक्रो जग्राह हस्तिनम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस महासर्प के मस्तक से मद की धारा बहने लगी, मानो पर्वत से झरना फूट रहा हो। एक दिन इन्द्र ने राजा धृतराष्ट्र का वेश धारण करके आकर उस हाथी को अपने वश में कर लिया।
 
A stream of intoxication started flowing from the forehead of that great serpent as if a waterfall was gushing out from a mountain. One day Indra came in the guise of King Dhritarashtra and took that elephant under his control.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)