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mahabharat 13.107.42: गौतम बोले - "उससे परे जो सनातन लोक है, जो शुद्ध सुगन्ध से युक्त है, रजोगुण से रहित है और शोक से रहित है, उसे गोलोक कहते हैं। मैं उस दुर्लभ और दुर्गम गोलोक में जाकर तुमसे अपना हाथी वापस ले लूँगा॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 13.107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.107.42 
गौतम उवाच
तत: परं भान्ति लोका: सनातना:
सुपुण्यगंधा विरजा वीतशोका:।
तस्मिन्नहं दुर्लभे चाप्यधृष्ये
गवां लोके हस्तिनं यातयिष्ये॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले - "उससे परे जो सनातन लोक है, जो शुद्ध सुगन्ध से युक्त है, रजोगुण से रहित है और शोक से रहित है, उसे गोलोक कहते हैं। मैं उस दुर्लभ और दुर्गम गोलोक में जाकर तुमसे अपना हाथी वापस ले लूँगा॥ 42॥
 
Gautama said, "Beyond that, the eternal world that is full of pure fragrance, devoid of the quality of passion and devoid of sorrow is called Goloka. I will go to that rare and difficult Goloka and take back my elephant from you.॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)