श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.106.9 
अहं तत्रावसं राजन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:।
तासां मे रजसा ध्वस्तं भैक्षमासीन्नराधिप॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! मैं भी उसी गाँव में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए और अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए रहता था। हे मनुष्यों के स्वामी! एक दिन मेरी भिक्षा उन गौओं के दूध और धूल के कणों से दूषित हो गई॥9॥
 
O King! I also lived in the same village observing celibacy and controlling my senses. O Lord of men! One day my alms were contaminated by the milk of those cows and dust particles.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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