श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.106.4 
साधुभिर्गर्हितं कर्म चाण्डालस्य विधीयते।
कस्माद् गोरजसा ध्वस्तमपां कुण्डे निषिञ्चसि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
चाण्डाल के लिए नियत कर्मों की निन्दा सज्जन पुरुष करते हैं। तुम संध्याकाल से व्याकुल होकर जल के कुण्ड में अपने शरीर को क्यों धो रहे हो?॥4॥
 
The noble men condemn the deeds prescribed for a Chandala. Why are you washing your body, devastated by the dusk, in a pool of water?॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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