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श्लोक 13.106.29  |
तस्माद् रक्ष्यं त्वया पुत्र ब्रह्मस्वं भरतर्षभ।
यदीच्छसि महाबाहो शाश्वतीं गतिमात्मन:॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| बेटा! भरतश्रेष्ठ! महाबाहु! यदि तुम शाश्वत जीवन प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें ब्राह्मण के धन की पूर्णतः रक्षा करनी चाहिए। 29॥ |
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| Son! Bharatshrestha! Great arms! If you want to attain eternal life then you should completely protect the wealth of Brahmin. 29॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि राजन्यचाण्डालसंवादो नामैकोत्तरशततमोऽध्याय:॥ १०१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवादविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं) |
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