श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.106.28 
भीष्म उवाच
इत्युक्त: स तदा तेन ब्रह्मस्वार्थे परंतप।
हुत्वा रणमुखे प्राणान् गतिमिष्टामवाप ह॥ २८॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - परंतु क्षत्रिय की यह बात सुनकर उस चाण्डाल ने ब्राह्मण के धन की रक्षा के लिए युद्ध के कगार पर अपने प्राण त्याग दिए और अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर लिया।
 
Bhishma says - But on hearing the Kshatriya say this, that Chandala sacrificed his life on the brink of battle to protect the wealth of a Brahmin and achieved the desired goal.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas