श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.106.27 
दत्त्वा शरीरं क्रव्याद्भॺो रणाग्नौ द्विजहेतुकम्।
हुत्वा प्राणान् प्रमोक्षस्ते नान्यथा मोक्षमर्हसि॥ २७॥
 
 
अनुवाद
यदि तू ब्राह्मण की रक्षा के लिए युद्धरूपी अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे दे और उसे कच्चा मांस खाने वाले पशुओं में बाँट दे, तो प्राण त्यागने से तेरा उद्धार हो सकता है; अन्यथा तुझे मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकेगा ॥27॥
 
If, for the sake of saving a Brahmin, you sacrifice your body in the fire of war and distribute it among the animals who eat raw meat, then by sacrificing your life you can be redeemed; otherwise, you will not be able to attain salvation. ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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