श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.106.25 
त्वमिमं सम्प्रपन्नाय संशयं ब्रूहि पृच्छते।
चाण्डालत्वात् कथमहं मुच्येयमिति सत्तम॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ! मैं आपकी शरण में आया हूँ और आपसे यह प्रश्न पूछ रहा हूँ। कृपया इसका समाधान बताइए। मैं चाण्डाल योनि से कैसे मुक्त हो सकता हूँ?॥ 25॥
 
O best of the virtuous! I have come to you in refuge and am asking you this question. Please tell me its solution. How can I be freed from the yoni of a Chandala?॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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