श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  13.106.22-23h 
तथा पापकृतं विप्रमाश्रमस्थं महीपते॥ २२॥
सर्वसंगविनिर्मुक्तं छन्दांस्युत्तारयन्त्युत।
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! जो ब्राह्मण आश्रम में रहकर सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होकर वेदों का पाठ करता है, यदि वह पापी भी हो, तो उसके द्वारा पढ़ा हुआ वेद उसे मुक्ति प्रदान कर देता है।
 
Prithvi Nath! A Brahmin who stays in an ashram and recites the Vedas, free from all kinds of attachments, even if he is a sinner, the Vedas recited by him will liberate him. 22 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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