श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  13.106.21-22h 
स्वाध्यायैस्तु महत्पापं हरन्ति गृहमेधिन:॥ २१॥
दानै: पृथग्विधैश्चापि यथा प्राहुर्मनीषिण:।
 
 
अनुवाद
गृहस्थ लोग वेद-शास्त्रों के स्वाध्याय तथा नाना प्रकार के दान द्वारा अपने महान पापों का नाश कर सकते हैं। जैसा कि बुद्धिमान पुरुष कहते हैं।
 
Householders can remove their great sins by self-study of the Vedas and scriptures and by giving various kinds of donations. As the wise men say. 21/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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