श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  13.106.15-16h 
नरकं त्रिंशतं प्राप्य स्वविष्ठामुपजीवति।
श्वचर्यामभिमानं च सखिदारे च विप्लवम्॥ १५॥
तुलया धारयन् धर्ममभिमान्यतिरिच्यते।
 
 
अनुवाद
वह तीस नरकों में गिरता है और अंततः अपने ही मल पर जीने वाला कीड़ा बनता है। यदि इन तीन पापों - कुत्ते पालना, अभिमान और मित्र की पत्नी के साथ व्यभिचार - को तराजू पर रखकर धर्मपूर्वक तौला जाए, तो अभिमान भारी पड़ेगा।
 
He falls into thirty hells and finally becomes a worm living on his own feces. If these three sins - rearing dogs, pride and adultery with a friend's wife - are put on a scale and weighed righteously, then pride will weigh heavier. 15 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)