श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.106.12 
तस्मात् सोमोऽप्यविक्रेय: पुरुषेण विपश्चिता।
विक्रयं त्विह सोमस्य गर्हयन्ति मनीषिण:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
इसलिए विद्वान पुरुष को सोमरस भी नहीं बेचना चाहिए । बुद्धिमान पुरुष इस संसार में सोमरस के विक्रय की घोर निंदा करते हैं । 12॥
 
That is why a learned man should not even sell Somra. Wise men strongly condemn the sale of Somras in this world. 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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