vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति
»
श्लोक 12
श्लोक
13.106.12
तस्मात् सोमोऽप्यविक्रेय: पुरुषेण विपश्चिता।
विक्रयं त्विह सोमस्य गर्हयन्ति मनीषिण:॥ १२॥
अनुवाद
इसलिए विद्वान पुरुष को सोमरस भी नहीं बेचना चाहिए । बुद्धिमान पुरुष इस संसार में सोमरस के विक्रय की घोर निंदा करते हैं । 12॥
That is why a learned man should not even sell Somra. Wise men strongly condemn the sale of Somras in this world. 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×