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mahabharat 13.106.11: इसलिए ब्राह्मण के धन में से कभी भी थोड़ा सा भी चोरी मत करना। धूल से सने हुए दूध रूपी ब्राह्मण के धन को खाकर मेरी क्या दशा हो रही है, यह तुम स्वयं देख सकते हो।॥11॥   |   mahabharat अध्याय 13.106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.106.11 
तस्माद्धरेन्न विप्रस्वं कदाचिदपि किंचन।
ब्रह्मस्वं रजसा ध्वस्तं भुक्त्वा मां पश्य यादृशम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इसलिए ब्राह्मण के धन में से कभी भी थोड़ा सा भी चोरी मत करना। धूल से सने हुए दूध रूपी ब्राह्मण के धन को खाकर मेरी क्या दशा हो रही है, यह तुम स्वयं देख सकते हो।॥11॥
 
Therefore, never steal even a little of a Brahmin's wealth. You can see for yourself the condition I am in after eating the Brahmin's wealth in the form of milk which was covered with dust. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)