श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.106.10 
चाण्डालोऽहं ततो राजन् भुक्त्वा तदभवं नृप।
ब्रह्मस्वहारी च नृप: सोऽप्रतिष्ठां गतिं ययौ॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! उस भिक्षा को खाने से मैं चाण्डाल हो गया और जिन राजाओं ने ब्राह्मण का धन चुराया था, वे भी नरक में गए॥10॥
 
O King! By eating that alms I became a Chandala and those kings who stole the Brahmin's wealth also went to hell.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)