श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  13.105.9-10 
स्नानेनाद्भिश्च यत् कर्म क्रियते वै विपश्चिता।
नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीयन्ति देवता:॥ ९॥
पितरश्च महाभागा ऋषयश्च तपोधना:।
गृह्याश्च देवता: सर्वा: प्रीयन्ते विधिनार्चिता:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
विद्वान् पुरुष जल में स्नान करके देवताओं आदि के लिए तर्पण आदि कर्म करते हैं, जिससे देवता, महाभाग पितर और तपोधन ऋषिगण संतुष्ट होते हैं और विधिपूर्वक पूजन होने पर घर के सभी देवता प्रसन्न होते हैं ॥9-10॥
 
The learned men, after bathing in water, perform tarpan etc. rituals for the gods etc., by which the gods, Mahabhag ancestors and Tapodhan sages are satisfied and after being worshiped properly, all the gods of the house are pleased. 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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