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mahabharat 13.105.7: गृहस्थ को यज्ञकर्म करने के बाद जो संतोष होता है, उससे सौ गुना अधिक देवताओं को प्रिय होता है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 13.105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.105.7 
यथा च गृहिणस्तोषो भवेद् वै बलिकर्मणि।
तथा शतगुणा प्रीतिर्देवतानां प्रजायते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थ को यज्ञकर्म करने के बाद जो संतोष होता है, उससे सौ गुना अधिक देवताओं को प्रिय होता है ॥7॥
 
The Gods love one hundred times as much as the satisfaction that a householder feels after performing a sacrificial act. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)