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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा
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श्लोक 6
श्लोक
13.105.6
यथा सिद्धस्य चान्नस्य ग्रहायाग्रं प्रदीयते।
बलयश्च गृहोद्देशे अत: प्रीयन्ति देवता:॥ ६॥
अनुवाद
जैसे अतिथि को पहले रसोई से भोजन परोसा जाता है, वैसे ही घर में देवताओं को भोजन अर्पित किया जाता है। इससे देवता प्रसन्न होते हैं॥6॥
Just as a guest is first served food from the kitchen, similarly food is offered to the deities in the house. This pleases the deities.॥ 6॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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