श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  13.105.36-37h 
एवं सम्भाषमाणं तु देवा: पार्थ पितामहम्॥ ३६॥
एवमस्त्विति संहृष्टा: प्रत्यूचुस्तं नराधिप।
 
 
अनुवाद
पितामह ब्रह्माजी का यह कथन सुनकर सब देवता हर्ष से भर गए और बोले - 'प्रभो! ऐसा ही हो।' ॥36 1/2॥
 
On hearing this statement of Grandfather Brahma, all the gods were filled with joy and said - 'Lord! Let it be so.' ॥ 36 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)