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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा
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श्लोक 35-36h
श्लोक
13.105.35-36h
न च शक्यं विना राज्ञा सुरा वर्तयितुं क्वचित्॥ ३५॥
तस्मादयं पुन: शक्रो देवराज्येऽभिषिच्यताम्।
अनुवाद
‘देवताओं! राजा के बिना कहीं भी रहना असम्भव है। अतः अपने पूर्व इन्द्र को पुनः देवताओं का राजा अभिषिक्त करो।’॥35 1/2॥
‘Gods! It is impossible to live anywhere without a king. Therefore, anoint your former Indra as the king of gods again.’॥ 35 1/2॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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