vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा
»
श्लोक 35-36h
श्लोक
13.105.35-36h
न च शक्यं विना राज्ञा सुरा वर्तयितुं क्वचित्॥ ३५॥
तस्मादयं पुन: शक्रो देवराज्येऽभिषिच्यताम्।
अनुवाद
‘देवताओं! राजा के बिना कहीं भी रहना असम्भव है। अतः अपने पूर्व इन्द्र को पुनः देवताओं का राजा अभिषिक्त करो।’॥35 1/2॥
‘Gods! It is impossible to live anywhere without a king. Therefore, anoint your former Indra as the king of gods again.’॥ 35 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×