श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  13.105.34-35h 
तत: शक्रं समानाय्य देवानाह पितामह:।
वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान्॥ ३४॥
स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गत:।
 
 
अनुवाद
तब पितामह ब्रह्मा ने इंद्र आदि देवताओं को बुलाकर उनसे कहा - 'देवताओं! नहुष ने मेरे वरदान के कारण राज्य प्राप्त किया था। किन्तु क्रोधित अगस्त्य ने उसे स्वर्ग से नीचे गिरा दिया। अब वह पृथ्वी पर चला गया।'
 
Then the grandfather Brahma called Indra and other gods and said to them - 'Gods! Nahush had attained the kingdom due to my boon. But the enraged Agastya threw him down from heaven. Now he went to the earth.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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