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mahabharat 13.105.27-28: महाराज! नहुष द्वारा किए गए विविध दान, तप और नियमों के कारण पृथ्वी पर गिरने पर भी उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति नहीं रही। उन्होंने भृगु को प्रसन्न करके कहा - 'प्रभो! मुझे जो शाप मिला है, उसका अंत हो जाए।'   |   mahabharat अध्याय 13.105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.105.27-28 
स तु तैस्तै: प्रदानैश्च तपोभिर्नियमैस्तथा॥ २७॥
पतितोऽपि महाराज भूतले स्मृतिमानभूत्।
प्रसादयामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति॥ २८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! नहुष द्वारा किए गए विविध दान, तप और नियमों के कारण पृथ्वी पर गिरने पर भी उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति नहीं रही। उन्होंने भृगु को प्रसन्न करके कहा - 'प्रभो! मुझे जो शाप मिला है, उसका अंत हो जाए।'
 
Maharaj! Due to the various donations made by Nahusha, the penance and rules that he had performed, even after falling on the earth, he did not lose the memory of his previous life. He pleased Bhrigu and said - 'Lord! The curse that I have received should come to an end.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)