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mahabharat 13.105.25-26h: भरतश्रेष्ठ! भृगु नहुष को दिखाई नहीं दे रहे थे। उनके इस प्रकार शाप देने पर नहुष सर्प का रूप धारण करके पृथ्वी पर गिरने लगे। 25 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.105.25-26h 
इत्युक्त: स तदा तेन सर्पो भूत्वा पपात ह॥ २५॥
अदृष्टेनाथ भृगुणा भूतले भरतर्षभ।
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! भृगु नहुष को दिखाई नहीं दे रहे थे। उनके इस प्रकार शाप देने पर नहुष सर्प का रूप धारण करके पृथ्वी पर गिरने लगे। 25 1/2॥
 
Bharatshrestha! Bhrigu was not visible to Nahush. On his cursing like this, Nahusha started falling on the earth in the form of a snake. 25 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)