श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 105: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.105.12 
कस्यचित् त्वथ कालस्य भाग्यक्षय उपस्थिते।
सर्वमेतदवज्ञाय कृतवानिदमीदृशम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
परन्तु कुछ समय बाद जब उसके सौभाग्य को नष्ट करने का अवसर आया, तब उसने इन सब बातों की उपेक्षा कर दी और ऐसे पापकर्म करने लगा॥12॥
 
However, after some time, when the opportunity to destroy his good fortune arose, he ignored all these things and started committing such sinful acts.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)