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mahabharat 13.104.29: भृगुजी से यह सुनकर अमर सखा वरुणकुमार अगस्त्यजी अत्यन्त प्रसन्न और निश्चिंत हो गए ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 13.104: नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 104: नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  13.104.29 
एवमुक्तस्तु भृगुणा मैत्रावरुणिरव्यय:।
अगस्त्य: परमप्रीतो बभूव विगतज्वर:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
भृगुजी से यह सुनकर अमर सखा वरुणकुमार अगस्त्यजी अत्यन्त प्रसन्न और निश्चिंत हो गए ॥29॥
 
On hearing this from Bhrigu, the immortal friend Varunkumar Agastyaji became very happy and relaxed. 29॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्यभृगुसंवादो नाम नवनवतितमोऽध्याय:॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भृगुका संवादनामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)