श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 104: नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.104.2 
धूपप्रदानस्य फलं प्रदीपस्य तथैव च।
बलयश्च किमर्थं वै क्षिप्यन्ते गृहमेधिभि:॥ २॥
 
 
अनुवाद
धूप और दीपदान का फल तो ज्ञात है, अब बताओ कि गृहस्थ लोग यज्ञ क्यों करते हैं?॥2॥
 
The result of offering incense and lamps is known. Now tell me why do householders offer sacrifices?॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)