श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 104: नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.104.12 
तस्य वाहयत: कालो मुनिमुख्यांस्तपोधनान्।
अहंकाराभिभूतस्य सुमहानभ्यवर्तत॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वह अभिमान से अभिभूत होकर धीरे-धीरे समस्त महातपस्वी मुनियों को अपने रथ में जोतने लगा। ऐसा करते-करते राजा को बहुत समय बीत गया॥12॥
 
Overwhelmed with pride, he gradually began harnessing all the great ascetic sages to his chariot. The king spent a long time doing this.॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)