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mahabharat 13.103.65-66: भीष्मजी कहते हैं - राजन! इस प्रकार शुक्राचार्य ने यह घटना दैत्यराज बलि को सुनाई और मनु तपस्वी सुवर्ण को उपदेश दिया। तत्पश्चात तपस्वी सुवर्ण ने नारदजी को बताया और नारदजी ने मुझे धूप, दीप आदि दान का पुण्य बताया। हे महाभाग! तुम भी इस विधि को जानकर इसके अनुसार सब कार्य करो। 65-66॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 65-66
 
 
श्लोक  13.103.65-66 
इत्येतदसुरेन्द्राय काव्य: प्रोवाच भार्गव:।
सुवर्णाय मनु: प्राह सुवर्णो नारदाय च॥ ६५॥
नारदोऽपि मयि प्राह गुणानेतान् महाद्युते।
त्वमप्येतद् विदित्वेह सर्वमाचर पुत्रक॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन! इस प्रकार शुक्राचार्य ने यह घटना दैत्यराज बलि को सुनाई और मनु तपस्वी सुवर्ण को उपदेश दिया। तत्पश्चात तपस्वी सुवर्ण ने नारदजी को बताया और नारदजी ने मुझे धूप, दीप आदि दान का पुण्य बताया। हे महाभाग! तुम भी इस विधि को जानकर इसके अनुसार सब कार्य करो। 65-66॥
 
Bhishmaji says – King! In this way Shukracharya narrated this incident to demon king Bali and preached it to Manu ascetic Suvarna. After that the ascetic Suvarna told Naradji and Naradji told me the virtues of donating incense, lamps etc. Great son! You too should know this method and do all the work according to it. 65-66॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णमनुसंवादो नामाष्टनवतितमोऽध्याय:॥ ९८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्ण और मनुका संवादविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)