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mahabharat 13.103.64: घर के इष्टदेवता उसके घर को सदैव प्रकाशित रखते हैं; अतः कल्याण चाहने वाले मनुष्य को चाहिए कि भोजन का प्रथम भाग अर्पण करके सदैव उनकी पूजा करे ॥ 64॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  13.103.64 
ज्वलन्त्यहरहो वेश्म याश्चास्य गृहदेवता:।
ता: पूज्या भूतिकामेन प्रसृताग्रप्रदायिना॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
घर के इष्टदेवता उसके घर को सदैव प्रकाशित रखते हैं; अतः कल्याण चाहने वाले मनुष्य को चाहिए कि भोजन का प्रथम भाग अर्पण करके सदैव उनकी पूजा करे ॥ 64॥
 
The presiding deities of a household always keep his house illuminated; therefore, a person wishing for welfare should always worship them by offering the first part of the food. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)