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mahabharat 13.103.55: अब मैं देवता, यक्ष, नाग, मनुष्य, भूत और राक्षस इनको यज्ञ करने से होने वाले लाभ और फल का वर्णन करूँगा ॥55॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.55 
बलिकर्मसु वक्ष्यामि गुणान् कर्मफलोदयान्।
देवयक्षोरगनृणां भूतानामथ रक्षसाम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
अब मैं देवता, यक्ष, नाग, मनुष्य, भूत और राक्षस इनको यज्ञ करने से होने वाले लाभ और फल का वर्णन करूँगा ॥55॥
 
I will now describe the benefits and fruits that arise from offering sacrifices to the gods, yakshas, ​​serpents, human beings, ghosts and demons. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)