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mahabharat 13.103.54: जो मनुष्य दीपदान करता है, वह अपने परिवार को प्रेरणा देता है, शुद्धचित्त और मंगलमय होता है और अन्त में प्रकाश लोक को जाता है ॥54॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.54 
कुलोद्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति।
ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नर: सदा॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य दीपदान करता है, वह अपने परिवार को प्रेरणा देता है, शुद्धचित्त और मंगलमय होता है और अन्त में प्रकाश लोक को जाता है ॥54॥
 
A man who donates a lamp, inspires his family, is pure minded and blessed with blessings and ultimately goes to the world of light. 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)