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mahabharat 13.103.45: अब मैं तुम्हें दीपदान का उत्तम फल बताता हूँ। दीपदान कब, कैसे और किसके द्वारा करना चाहिए? सुनो, मैं तुम्हें यह सब बताता हूँ ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.45 
दीपदाने प्रवक्ष्यामि फलयोगमनुत्तमम्।
यथा येन यदा चैव प्रदेया यादृशाश्च ते॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
अब मैं तुम्हें दीपदान का उत्तम फल बताता हूँ। दीपदान कब, कैसे और किसके द्वारा करना चाहिए? सुनो, मैं तुम्हें यह सब बताता हूँ ॥ 45॥
 
Now I shall tell you about the best result of donating lamps. When, how and by whom should lamps be given? Listen, I shall tell you all this. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)