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mahabharat 13.103.43: ऐसी धूप देवताओं, दानवों और भूतों को तत्काल तृप्ति प्रदान करने वाली मानी गई है। इनके अतिरिक्त मनोरंजन (भोग-विलास) के लिए प्रयुक्त होने वाली अन्य अनेक प्रकार की धूपें भी हैं, जिनका उपयोग केवल मनुष्य ही करते हैं। ॥43॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.43 
देवदानवभूतानां सद्यस्तुष्टिकर: स्मृत:।
येऽन्ये वैहारिकास्तत्र मानुषाणामिति स्मृता:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
ऐसी धूप देवताओं, दानवों और भूतों को तत्काल तृप्ति प्रदान करने वाली मानी गई है। इनके अतिरिक्त मनोरंजन (भोग-विलास) के लिए प्रयुक्त होने वाली अन्य अनेक प्रकार की धूपें भी हैं, जिनका उपयोग केवल मनुष्य ही करते हैं। ॥43॥
 
Such incense is considered to provide instant satisfaction to gods, demons and ghosts. Apart from these, there are many other types of incense used for recreational activities (enjoyment and luxury), which are used only by humans. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)