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mahabharat 13.103.40: वृक्षों के रस (गोंद) को 'निर्यास' कहते हैं। सल्लकी वृक्ष के अतिरिक्त अन्य वृक्षों से उत्पन्न 'निर्यासम' धूप देवताओं को अत्यंत प्रिय है। उनमें गुग्गुल सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा बुद्धिमान पुरुषों का मत है ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  13.103.40 
निर्यासा: सल्लकीवर्ज्या देवानां दयिताऽस्तु ते।
गुग्गुलु: प्रवरस्तेषां सर्वेषामिति निश्चय:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
वृक्षों के रस (गोंद) को 'निर्यास' कहते हैं। सल्लकी वृक्ष के अतिरिक्त अन्य वृक्षों से उत्पन्न 'निर्यासम' धूप देवताओं को अत्यंत प्रिय है। उनमें गुग्गुल सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा बुद्धिमान पुरुषों का मत है ॥40॥
 
The sap (gum) of trees is called Niryas. The Niryasam incense produced from trees other than the Sallaki tree is very dear to the gods. Among them, Guggul is the best. This is the opinion of wise men. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)